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बेटे की बीमारी से पसीजा मां का दिल, मंदबुद्धि बच्चों को बना रहीं रोजगार के काबिल

लुधियाना: कोई माता-पिता यह नहीं चाहता है कि उसकी संतान दिव्यांग हो और दूसरों की दया पर जिंदगी गुजर-बसर करे। दिव्यांग होने के जेनेटिक कारण भी हो सकते हैं जो उसके जन्म के साथ और बढ़ती उम्र में पता चलता है। ऐसे में जरूरत होती है कि मां-बाप को हौसला रखकर दिव्यांग बच्चे को अच्छी तरह प्रशिक्षण और मेडिकल थैरेपी दिलाएं, ताकि वह अपने स्तर पर कुछ करने के योग्य बन सकें। कुछ ऐसा ही लुधियाना की प्रसिद्ध गाइनोकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम सोढ़ी के साथ हुआ था। वर्ष 1999 में उनका बेटा जन्म के समय रोया नहीं और वह सेरेब्रल पाल्सी से पीडि़त हो गया। उसे दिमागी लकवा कहते हैं। ऐसे में एक डॉक्टर होने के नाते डॉ. नीलम और डॉ. आरएस सोढ़ी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने सेरेब्रल पाल्सी से पीडि़त बेटे की परवरिश में पूरी ताकत लगा दी। जीएनई से बीटेक और एमटेक करवाई। अब उनका बेटा जसविंदर सिंह जो खुद अच्छी तरह लिख नहीं सकता, अच्छी तरह चल फिर नहीं सकता फिर भी वह बेंगलुरु की इंटरनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर डवलपर है।
दैनिक जागरण से बातचीत में गाइनोकोलॉजिस्ट डॉ. नीलम ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे की बीमारी को देख ऐसे अन्य बच्चों की देखरेख व उन्हें ठीक करने के लिए आशीर्वाद द नॉर्थ इंडिया सैरेब्रल पाल्सी एसोसिएशन की शुरुआत 1999 में की। तब से लेकर दिमागी लकवे से शिकार बच्चों के लिए यह संस्था काम कर रही है।
समाज सेविका डॉ. नीलम ने बताया कि अभी तक पंजाब में ऐसा कोई सेंटर नहीं था जहां पर मंदबुद्धि बच्चों को प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाकर रोजगार कमाने के योग्य बनाया जा सके। इस पर उन्होंने वर्ष 2016 में लुधियाना के मिनी सचिवालय के सुविधा सेंटर में सशक्त कैंटीन प्रोजेक्ट शुरू किया जिसे मंदबुद्धि बच्चे कैंटीन की पूरी देखरेख कर काम करते हैं। वे इस सशक्त कैंटीन में ऑन जॉब ट्रेनिंग कर काम करना सीखकर आजीविका कमा रहे हैं।
इस सशक्त कैंटीन में काम करने वाले मंदबुद्धि युवा दो से तीन हजार रुपये वेतन ले रहे हैं। मंदबुद्धि युवा लोगों के बीच रहना, बातें करना, कैसा व्यवहार और आचरण करना, पैसे गिनना, ऑर्डर पर स्नेक्स तैयार करना सीख चुके हैं। सशक्त कैंटीन प्रोजेक्ट तक मंदबुद्धि युवा सुबह 9 से शाम साढ़े 3 बजे तक कचहरी में आने वाले लोगों के खाने के ऑर्डर जैसे ब्रेड पकौड़े, ब्रेड रोल, कट-लेट, परांठा, सैंडविच, वेजिटेबल सैंडविच, चाय-कॉफी, राजमा-चावल, कड़ी चावल, रोटी, पुलाव और मैगी बनाकर देते हैं।
अभी तक सशक्त कैंटीन प्रोजेक्ट के तहत 9 मंदबुद्धि युवा काम करना सीख चुके है। पांच मंदबुद्धि युवा यहां से प्रशिक्षण लेकर एक अपने पिता की दुकान, एक प्री-स्कूल में कुक और दो अपना काम कर रहे हैं। इस समय सशक्त कैंटीन में चार मंदबुद्धि युवा हरसिमरण सिंह, वरिंदर कुमार, अंकुर मेहरा और गुरलीन कौर काम कर रहे हैं। उनकी मदद के लिए एक कुक विद्या और सुपरवाइजर जया शर्मा हैं।
डॉ. सोढ़ी ने बताया कि दिव्यांग बच्चों के प्रति अभिभावकों की यह सोच अभी भी है कि ये बहुत नाजुक हैं, काम कैसे करेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक उनको प्रशिक्षण व थैरेपी नहीं दी जाएगी, वो वो आत्मनिर्भर नहीं बनेंगे। इसलिए उनको यह सोच बदलनी होगी और बच्चों को थैरेपी देते हुए व प्रशिक्षण देकर आत्मनिर्भर बनाना होगा।
सशक्त कैंटीन प्रोजेक्ट की संचालिका डॉ. नीलम सोढ़ी ने कहा कि मंदबुद्धि बच्चों का दिमाग अन्य बच्चों की तुलना में कम होता है। कई बोल नहीं सकते, कुछ सुन नहीं सकते, सही-चल-फिर नहीं सकते आदि जैसी समस्याएं आती हैं। सेरेब्रल पाल्सी बीमारी का कारण जन्म के समय बच्चे में जीन्स एक्सट्रा होना, मानसिक विकास पीछे होना, जन्म के समय बच्चे का न रोना, मां की कोख में पूरी खुराक न मिलना, पैदा होने के समय पूरी ऑक्सीजन न मिलना समेत अन्य कारण हैं।
डॉ. सोढ़ी के मुताबिक 100 में से 2 से तीन बच्चे इस सेरेब्रल पाल्सी बीमारी से पीडि़त होते हैं। यह बीमारी उम्रभर इसलिए रहती है। इसका कारण अभिभावकों द्वारा उनको पूरा समय न देना, मेडिसन, अभ्यास, थैरेपी, आर्थिक तंगी होता है। डॉ. नीलम ने कहा कि सशक्त कैंटीन प्रोजेक्ट में कोई भी माता-पिता जिनके बच्चे मंदबुद्धि हैं, उनको प्रशिक्षण लेने व आत्मनिर्भर बनाने के लिए भेज सकते हैं। इस प्रोजेक्ट पर डॉ. नीलम सोढ़ी, डॉ. आरएस सोढ़ी, हरजीत रेखी, दविंदर सिंह रेखी, गुरप्रीत सिंह मिगलानी, डॉ. दुआ, जीएस रेखी, डेजी परूथी व गीतांजल सेठ बख्शी सहित अन्य सदस्य शामिल हैं।




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